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बुधवार, 22 जुलाई 2020

जीवित्पुत्रिका व्रत 2020 Date I जीतिया व्रत 2020 date

माँ एक ऐसा अक्षर मानो जिसमे पूरी दुनिया की ममता समाई हो। जी हाँ, आज हम जिस व्रत के बारे में बात करने वाले हैं। उसका सीधा संबंध माँ औऱ उसकी ममता से ही है।
अपनी संतान को इस दुनिया मे लाने के लिए वो जितना कष्ट सहती है। उतना ही उसकी जिंदगी की सलामती के लिए भी करती है।उसके तो हर पल में संतान की खुशहाली की कामना होती है। माँ का महातम ही इतना बड़ा होता है। शायद इसीलिए इस कठिन व्रत को करने का सौभाग्य एक माँ को ही नसीब होता है।



                 जीवित्पुत्रिका व्रत  जीतिया व्रत  2020


जीवित्पुत्रिका व्रत को जितिया नाम से अधिक जाना जाता है। बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश के लोगो मे यह खासकर मनाया जाने वाला व्रत है।

इस साल यह 10 सितंबर को मनाया जाएगा। अश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को पड़ने वाल यह व्रत बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। इसके तीन चरण होते हैं। आईए विस्तार से जानते हैं।


                 जीवित्पुत्रिका व्रत  जीतिया व्रत  2020



पहला चरण(नहाय खाय):

व्रत के एक दिन पहले मतलब सप्तमी को नहाय खाय होता है। इस दिन माताएं नहाने के बाद ही भोजन करती है। जो पूरी तरह सात्विक होता है। भोजन में मड़ुआ (एक तरह का अनाज) के आटे से बनी रोटी का विशेष महत्व होता है साथ ही कांदा(एक तरह का कंद मूल ) की सब्जी, नोनी का साग और सीजन की सभी हरी सब्जियां शामिल होती है।इसके बाद रात में माताएं आपनी संतान के लिए खाने में मीठा जरूर बनाती है जिसमे मालपुआ का विशेष महत्व होता है।एक अंतिम पड़ाव होता है सर्गही। जिसे खाकर वो दूसरे दिन अष्टमी को अपना निर्जला व्रत रखती है। सर्गही में आटे से बनी छोटी छोटी लोई होती है जो दूध और गुड में पकी होती है।


दूसरा चरण( निर्जला उपवास):

पूरे नियम से नहाय खाय करने के बाद में मातायें निर्जला उपवास का आरम्भ करती हैं। सुबह उठने के बाद माताएं जिस हालात में हैं उसी हालत में शाम तक रहती हैं। कहने का मतलब यह है कि नहाना, मुँह धोना सब शाम को होता है। तबतक वे उसी हालत में रहती है जिस से इस व्रत की कठिनता ओर भी बढ़ जाती है। शाम को माताएं दातून से या अपने आँचल के पल्लू से दांत साफ करती है।( कहीं कहीं दातून का इस्तेमाल वर्जित माना जाता है ) स्नान करने के बाद शाम को मातायें एक जगह इकठ्ठा होकर पूजा करती है और कथा सुनती है। (अलग अलग जगह पूजा की अलग अलग मान्यता है। इसीलिये पूजा का कोई विशेष नियम नही होता।) कई मातायें सोने का जितिया बना के उसकी पुजा कर गले मे धारण करती हैं, तो कई बिना पूजा किये भी व्रत जारी रखती हैं। पूरा दिन गुजरने के बाद पूरी रात निर्जला रहती हैं जो बेहद ही मुश्किल होता है खासकर उनके लिए जो ज्यादा उम्र की होती हैं। पर मन मे संतान की दीर्घायु की कामना लिए इस मुश्किल वक़्त को भी काट लेती है। इस तरह पारण के समय तक निर्जला रहती हैं।



                जीवित्पुत्रिका व्रत  जीतिया व्रत  2020




तीसरा चरण ( पारण ):

अब अंतिम चरण होता है पारण का। पारण का मतलब व्रत का सही समय, सही विधि और नियम से समापन करना।व्रत  के अगले दिन यानी नवमी को व्रती मातायें भोर में उठ जाती है। स्नान आदि करने के बाद भगवान की पूजा करके अपनी संतान की दिर्घायु की कामना करती है। धूप दीप से पूजा अर्चना करने के बाद एक घड़े में जल लेती है साथ ही पांच तरह के बीजों को (इसमे खीरा, धान, जौ,साबुत अनाज,नोनी के साग की पत्तियां ) जल के साथ निगलती है और पारण करती है। इसके बाद भोजन में कढ़ी चावल, चने के साथ बनी सब्जी, कंद की सब्जी और मडुवे की रोटी जैसे व्यंजनों से व्रत का पूरी तरह से समापन करती है।

   
व्रत की पौराणिक मान्यता:
 इस व्रत की पौराणिक मान्यता महाभारत काल से जुुड़ी हुुुई मानी जाती है। इसके अनुुुसार अश्वत्थामा अपने पिता की मृत्यु का प्रतिशोध लेेनेे के लिए जब पाडवो की हत्या करने जाता है तब उनकी जगह  उनके पांचो पुत्रो की हत्या कर देता है। साथ ही उत्तरा के गर्भ में पल रहे संतान की भी हत्या कर देता है। लेकिन उस बच्चे का जन्म लेना जरूरी था इसलिए भगवान कृष्ण उसे गर्भ में फिर से जिंदा कर देते है। और उस बच्चे का नाम 'जीवित्पुत्रिका' रखा गया। तभी से इस व्रत को मनाया जाने लगा।

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